उम्मीद

उम्मीद
कभी नहीं छोड़नी चाहिये ।

मैं आज भी रोज की तरह घर से बैंक की ओर अपनी बाइक से निकला । जब मैं 10 कि.मी. की दूरी पर पहुँचा, तभी मैंने उस लड़के को देखा । जिससे मैं कल भी इसी टाइम के आस-पास मिला था । वो लड़का आज भी हाथ दिखाकर बाइक वालों को रोक रहा था या ये कहे कि उसे लिफ्ट चाहिये थी जो उसको उसके कॉलेज छोड़ने में मदद करें । मैंने उस लड़के को दूर से ही देख लिया था और अपनी बाइक वहाँ जाकर रोक दी, जिससे वो लड़का, मेरी बाइक पर बैठ सके ।
रोज़ इतने बजे जाते हो, कॉलेज के लिये । मैंने अपने हैलमेट का शीशा थोड़ा ऊँचा करके उससे पूछा, जिससे वो मेरी आवाज़ सुन सके ।
जी । रोज यही से जाता हूँ लेकिन यहाँ कोई बस वाला अपनी बस नहीं रोकता इसलिये रोज लिफ्ट माँगकर ही जाना पड़ता है ।
कितनी देर से खड़े थे ?, मैंने मुस्कुराकर उससे पूछा ।
करीब 15 मिनट । उसने थोड़ा आगे आकर मेरे कान के करीब कहा । जिससे मैं उसकी आवाज़ आराम से सुन सकूँ ।
रोज कोई ना कोई मिल जाता हैं, मैंने पूछा और बाइक के ब्रेक तेजी से दबाये । जिससे वो ब्रेकर को आराम से पार कर जाये ।
हाँ । भले ही थोड़ी देर लग जाये लेकिन कोई ना कोई जरुर मिल जाता हैं, जो मुझे आगे तक छोड़ देता है ।
किसी दिन ‘कभी कोई नहीं मिला तो’ ! मैंने गर्दन हल्की सी घुमाकर उससे ये सवाल पूछा ।
ऐसा नहीं हो सकता ! कोई ना कोई तो जरुर मिलेगा ! सर ‘इन्सान को “उम्मीद” ‘कभी नहीं छोड़नी चाहिये’ क्योंकि “उम्मीद” पर ही दुनिया टिकी है’ । भले ही देरी से मिले लेकिन मिलेगा जरुर । मैं जब भी कॉलेज जाने के लिये घर से बाहर निकला हूँ तो कॉलेज पहुँचकर ही वापिस घर आता हूँ ।
“उम्मीद” ही है ‘जो इन्सान को कुछ करने की ‘उम्मीद’ जगाती है’ । अच्छा सर! यही रोक दीजिये मेरा कॉलेज आ गया । उसने मेरे कन्धे पर हाथ रखकर बाइक को रोकने का इशारा करते हुये कहा ।
थैंक यू सर! उसने जाते हुये कहा ।
उसने जाने के बाद मैं दिन-भर यही सोचता रहा कि वो लड़का कितनी बड़ी बात कह गया, “उम्मीद” इन्सान को कभी नहीं छोड़नी चाहिये और मैं पागल, उसके वापिस आने की “उम्मीद” ही छोड़ बैठा । क्या पता ! वो पगली मेरा आज भी वहाँ आकर रोज इन्तजार करती हो, जहाँ हम ज्यादातर मिला करते थे । क्या पता ! वो रोज वहाँ आकर मेरे आने की “उम्मीद” करती हो । लेकिन उसे क्या पता ‘मैं यहाँ कब से “उम्मीद” हार कर बैठा हूँ’ ।
गोपाल ! तुझे एक बार तो जरुर जाकर देखना चाहिये । मेरे दिल ने मुझसे कहा और अगले दिन मैंने ब्रान्च मैनेजर से छुट्टी की बात करने की सोची ।
गुड मार्निंग सर ! मैंने अगले दिन बैंक में पहुँचकर मैनेजर से कहा ।
गुड मार्निंग ‘गोपाल’ । और कैसा चल रहा हैं सब? उन्होनें अपना मोबाइल चार्जिंग पर लगाते हुये मुझसे पूछा ।
सर ! मुझे 1 हफ्ते की छुट्टी चाहिये । घर जाना पड़ रहा है जरुरी काम है । मैंने कुर्सी पर बैठते हुये थोड़ा संकोच करके छुट्टी की बात कही । क्योंकि मैंने पिछले हफ्ते ही 2 दिन की छुट्टी ली थी ।
कब जाना है ? उन्होनें कम्प्यूटर में मेल पढ़ते हुये पूछा ।
28 तारीख को सर ! मैंने कैलेण्डर में देखते हुये कहा ।
यानि परसों । उन्होंने कैलेण्डर में देखकर छुट्टी का हिसाब लगाते हुये कहा ।
लीव एपलिकेशन दे दीजिये । इतना कहकर वो अपने काम में लग गये ।
बैंक से आने के बाद, अगले दिन मैंने अपना तत्काल टिकट बुक कराया । ‘पटना’ के लिये । और जाने के लिये ‘नासिक’ के रेलवे स्टेशन पहुँच गया । आज अन्दर से दिल बहुत खुश लग रहा था । शायद “उम्मीद” जाग गयी थी कि वो मेरा आज भी वहाँ इन्तजार कर रही होगी । मैं ट्रेन में बैठे-बैठे उसके सपने देखने लगा कि वो ‘इको पार्क’ में बैठी हुयी है । उसकी नजरें पार्क में चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मुझे ही ढूढ़ रही हैं । ऐसे ना जाने कितनी यादें तुरन्त मेरे जह़न में आने लगी ।
‘वैली रोड’, ‘इको पार्क’ चलोगे । मैंने स्टेशन के बाहर आकर एक ऑटो वाले से पूछा ।
बैठिये । उसने बिना बोले गर्दन हिलाकर ऑटो में बैठने का इशारा किया ।
शाम के 4 बज रहे थे । मैं ‘इको पार्क’ में पिछले 1 घंटे से बैठा था और अपनी ही यादों में खोया था। कैसे हम ! इसी सीट पर ज्यादातर आकर बैठते थे । कैसे ! हमने अपना पहला चुम्बन इसी पार्क में किया था । मैं पार्क में बैठा उन सभी जोड़ो को देख-देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था, अपनी यादों को याद करके ।
बहुत देर लगा दी आने में ! मम्मी ने कहा । जब मैं घर करीब रात के 9 बजे तक पहुँचा क्योंकि मेरा पहला दिन बर्बाद हो गया था । मुझे वो आज नहीं मिली लेकिन मैंने “उम्मीद” नहीं छोड़ी ।
हाँ ! ट्रेन लेट हो गयी थी। मैंने बैग रखने के बाद जूते उतारते हुये कहा ।
अचानक ! आना कैसे हो गया ? मम्मी ने प्लेट में काजू की वर्फी देते हुये मुझसे पूछा ।
मन नहीं लग रहा था इसलिये आ गया । मैंने असली वज़ह छिपाते हुये कहा कि मैं ‘पटना’ उसको ढूढ़ने आया था ।
फ्रेश-व्रेश हो लो । उसके बाद मैं खाना लगा देती हो। मम्मी ने बैग उठाकर अलमारी में रखते हुये कहा ।
मम्मी! मैं दोस्तों से मिलने जा रहा हूँ और रात तक आऊँगा । मेरा खाना मत बनाना। मैंने अगले दिन सुबह-सुबह उठकर मम्मी से कहा, जब मैं दोबारा उसी ‘पार्क’ में जा रहा था ।
रात में जल्दी आ जाना ! ज्यादा देर मत लगाना । मम्मी ने दरवाजा बन्द करते हुये कहा ।
आज मैं फिर उसी ‘पार्क’ में सुबह से जाकर बैठ गया और फोन निकालकर, उसका वही पुराना नम्बर डॉयल करने लगा, जिसे मैं आज तक नहीं भूला था । जिस नम्बर को हम दोनों ने गुस्से में आकर बदल दिया था। करीब 1 साल पहले । जब हम दोनों में आपस में किसी बात पर कहा-सुनी हो गयी थी ।
“जो आपने नम्बर डॉयल किया हैं, वो मौजूद नहीं । कृपया नम्बर जाँच ले और दोबारा डॉयल करें”। हर बार ऑपरेटर यही लाइन बोल रही थी क्योंकि मैंने अब तक उसका फोन नम्बर कम से कम 50 बार डॉयल कर दिया था और आज मेरा दूसरा दिन भी गुजर गया लेकिन वो मुझे आज भी नहीं मिली ।
मैं अपना उदास सा चेहरा लेकर घर वापिस आ गया और सोशल साइट्स पर, उसको सर्च करने लगा कि कहीं शायद उसने अब सोशल साइट्स पर जॉइन कर लिया हो । जिसको वो उस समय बकवास बताती थी और अपने अगले दिन का इन्तजार करने लगा । लेकिन अपनी “उम्मीद” नहीं छोड़ी क्योंकि मुझे उस लड़के की वो बात याद आ गयी कि “उम्मीद कभी भी नहीं छोड़नी चाहिये, भले ही थोड़ी देर लग जाये, लेकिन मिलेगा जरुर” ।
इसी “उम्मीद” से मेरे ‘पटना’ में 4 दिन बीत गये और ‘पटना’ मैं आज मेरा आखिरी दिन था । आज बहुत अजीब सा लग रहा था ‘ना जाने क्यों?’ । आज लग रहा था कि मेरी “उम्मीद” ना टूट जाये क्योंकि मैं पार्क में पिछले 6 घंटे से बैठा हुआ था और बार-बार गेट की तरफ ही देख रहा था । शायद इस “उम्मीद” से कि वो यहाँ आती हो, मेरा इन्तजार करने !
शाम के 6 बज चुके थे । मैंने अपनी पानी की बोतल उठायी और घर जाने के लिये उठकर खड़ा हो गया और गेट की ओर बढ़ने लगा ।
‘गोपाल’! किसी ने मेरे पीछे से बहुत तेज आवाज़ लगायी और इस आवाज़ को मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकता था । मेरे चेहरे पर अपने आप ही एक मुस्कुराहट आ गयी । दिल को इतनी खुशी मिली, जैसे- ‘किसी भूखे को खाने के लिये रोटी’ । ‘किसी नंगे को पहनने के लिये कपड़े’ । ‘किसी गरीब को पैसा’ और ‘मुझ जैसे तन्हा इन्सान को मेरा प्यार वापिस मिल गया हो’ ।
वो भागती हुयी मेरे पास आ रही थी । शायद इस “उम्मीद” से कि मैं फिर कहीं, उससे दूर ना हो जाऊँ और उसने मुझे आकर ही गले लगा लिया ।
‘गोपाल’! कब से तुम्हारा इन्तजार कर रही थी । उसने अपने चेहरे को पोछतें हुये कहा, जो उसके आँसुओं से गीला हो गया था ।
‘मैं भी’! मैंने बस इतना कहा और अपनी आँखे ऊपर करके आसमान की तरफ देखने लगा । वो आँखे उस भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी जिसकी “उम्मीद” मैं पिछले 1 साल से हार कर बैठा था ।
आज मुझे एक बात और समझ में आयी कि इन्सान को कभी भी किसी भी हाल में “उम्मीद” नहीं छोड़नी चाहिये । चाहे वो “उम्मीद” परीक्षा में पास होने की, जिन्दगी में सफल इन्सान बनने की या मुझ जैसे इन्सान को अपना प्यार पाने की हो । “उम्मीद” कभी नहीं छोड़नी चाहिये ।

शिवम् गुप्ता………..

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