प्रेम की अगन

प्रेम जाल की अगन में जला के तुझको भष्म करूँ फट स्वाहा, स्वाहा, स्वाहा |
जब साम ढले पीपल तले लेकर तुझको मई मस्त करू , फट स्वाहा, स्वाहा,स्वाहा |
जब रत हो नदी तट पर तेरे संग रोमांस करूँ , फट स्वाहा , स्वाहा,स्वाहा |
प्रेम जाल के अगन में सी सोर पर लेकर तुझको मै नृत्य करूँ फट स्वाहा, स्वाहा, स्वाहा |
तेरे नैनो के वार लगे दिल में बार बार दिन रात तेरी सपने आते है ,
लिविंग रिलेशनशिप में रहते है हम दोनों
सोचता हूँ कब कर लू तुझसे ब्याह फट स्वाहा ,स्वाहा ,स्वाहा |

तेरे रूप की ये रौनक दिल करता है देखू बार बार ,
अपनी साड़ी कमाई मैंने तेरे ऊपर है लुटाई मै हूँ
शारीर और तू मेरी आत्मा तुझसे मिलने के लिए हूँ बरसो से प्यासा |
मै हूँ प्रेमी और तू मेरी प्रेमिका
तेरे बिन जी नही मेरा कही पर लगता भष्म पट स्वाहा स्वाहा स्वाहा |

लव मैसेज भेज कर करूँगा तुझको प्रपोज सावन के मौसम में करूँगा तेरे संग रोमांस ,
और प्रेम प्याले से करूँगा तुझको तृप्त भष्म पट स्वाहा स्वाहा स्वाहा |
तू है उर्वसी मेनका से भी हसीन इंद्रा भी तुझको पाने के लिए करे हवन यज्ञ बार बार |
बड़े बड़े तपसियों के ताप है तूने भंग किये ,
सन्यासी भी अपना सन्यासी जीवन त्याग कर करना चाहते है
तेरे रूप का पान भष्म पट स्वाहा स्वाहा स्वाहा |
रम्भा तिलोक्त्मा और पुश्प्देहा अप्सराओं के जैसी है तुझमे सुन्दरता ,
प्रभु ने बड़ी कुशलता से किया है तेरा निर्माण भष्म पट स्वाहा स्वाहा स्वाहा |

………………… REPEAT SONG

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