रूप की रानी

तुम रूप की रानी हो तुम कंचन से बनी हो।
बडी सुन्दर लग रही हो मेरे दिल मैं बस गई हो।।
जब तुमको बनाया होगा रब अच्छे मूड मैं होगा।
तभी तो तुम हूबा हू रब सी दिख रही हो।।
खुशबू से तेरे तन की ये धरती महक रही है
सबकी नज़र जानूं तुझपे उठ रही है
पलकें बन्द करलोअपनी
सब बरबाद हो रहै हैं
मुफ्त की पीके मय सब बहक रहै हैं।
सब बहक रहै हैं सब बहक रहै हैं
दिल जवां सब तुझपे मर गये हैं।।
न जानें जानूं किसको तू मिलेगी।
न जाने किसपे रब की महर होगी।।
लेखक प्रदीप सक्सेना
सदस्य फिल्म राईटर एसोसियशन
दि 10_4_18

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