समंदर किनारे

आज देखि खुबसुरती समंदर किनारे
उडती जुफोने दिलकश करदिये नज़ारे

नज़ारे जुकाके जितले कोही भीहो ख़िताब
शर्माए तो लगे पूरी ग़ज़ल की हो किताब

हवाओ ने शरारत करदी उनकी जुल्फोको उल्जादी
पर वोतो उल्जी जुल्फो मे भी लगतिथि शेहजादी
दो नशीली आखोमे खोकर भुला ऐ जहरे
आज देखि एक खुबसुरती …………..

कोमल बदन और शरारत भरी जवानी
आखे कहति थि परियो की कहानी

धीरे धीरे चलनेका क्या अंदाज़ था
जिसमे हुस्नका का गहरा राज था

साजिश थी समंदर की तुमे खुश करने के लिए
लहेर आती थी किनारे बस तेरे पैर छूने के लिए
जिंदगी बीत जाये बस तेरे नाम के सहारे
आज देखि एक खुबसुरती ……….

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