Maakhan Jism

 

शेर
तेरी तारीफ़ में एक छोटा सा शब्द लाया हूँ।
तेरी तारीफ़ में एक छोटा सा शब्द लाया हूँ, मगर डरता हूँ।
अपने आप को खुदा सुनकर कहीं तू मुझे मिट्टी न कर दे।।

Para 1
i.)
साईं इतना मुझको दे।
जिस्म मेरा करना दे।
उसके हुस्न की नमाजों को क़ज़ा।।
ii.)
नटखट है दिल मेरा।
माखन सा जिस्म तेरा।
शरारतों को मेरी दे अपनी रज़ा।।
iii.)
तेरे लबों का मुरीद हूँ।
कभी तो हो मुझसे रूबरू।।
iv.)
तेरी कमर कितनी मदहोश है।
मेरी बांसुरी को भी कहाँ होश है।।
v.)
तेरा बे-चेन नूर सताता है मुझे।
अँधेरों में रिझाता है मुझे।।
vi.)
मेरी रूह की हैं शिकायतें, बेजुबां दिल को न सताया कर।
फरमा इन्हें इनायतें, लबों से लब मिलाकर बात कर।।
कंकड़ कंकड़ कह कर न पराया कर,
तू सिर्फ मेरी है हर शाम मुझे जताया कर।।
vii.)
हटा कर हया के पर्दे, कर प्यार के सजदे मेरे संग।
मेरी आँखों के दर्पण में देख अपना गीला अंग।
किस कदर उमड़ रहा है तुझमें मेरा नीला रंग।।
viii.)
मेरे तन को जोगी सब करें, मन को बिरला करे न कोई।
सब सिद्धि सहजे तूने पाइए, कासे मोरा मन जोगी हाई।।
ix.)
तेरी आबरू का तलबगार हूँ।
अपने आगोश में भर ले मुझे,
मेरे सब्र का न ले मज़ा।।
ia.)
साईं इतना मुझको दे।
जिस्म मेरा करना दे।
उसके हुस्न की नमाजों को कज़ा।।
ib.)
नटखट है दिल मेरा।
माखन सा जिस्म तेरा।
शरारतों को मेरी दे अपनी रज़ा।।
para 2
i.)
है कितना प्यारा तेरे जिस्म का शहर।
बना के रख लूँ इसमें अपने अरमानों का महल।।
ii.)
पाकर तेरे जिस्म का बसर।
पा लिया है मैंने रब का घर।।
iii.)
मेरे इरादे समझ रही है, तेरे चहरे की लाली।
आँखें सौ जाएँ तेरी, चुरा लाऊँ तेरे होंठों की प्याली।।
iv.)
पर्दे में बंद, तेरा रूठा बदन, मारता है ताना।
आता नहीं है मुझको प्यार जताना।।
v.)
इतराती फिरती तेरी अंगड़ाइयाँ।
बनने लगी हैं मेरे तन्हा जिस्म की सखी सहेलियाँ।
इशारों में बुलाकर ले जाती हैं, तेरी कलाइयाँ।
औढ़नी में छुपकर चखाती हैं, तेरे होंठों की पंखुड़ियाँ।।
vi.)
सवेरे निकल जाता हूँ खेलने, तेरी ज़ुल्फों के आँगन में।
शाम को लौटता हूँ, तेरी पाक मिट्टी में मेला हो कर।
मेरे रूखे मन का कितना ख़्याल रखती है तेरी बचकानी आदत।
सिमट जाती है मुझमें चुपके से दबे पाऊँ आकर।।
vii.)
मेरे तन पे लगा के अपने योवन की धूप।
बड़े प्यार से परोसा है तूने रंग रूप।।
viii.)
समा रहा हूँ तुझमें ऐसे।
दो जिस्म एक परछाई हो जैसे।।
ix.)
क्या खूब बरस रही है मुझपे रब की महर।
चूमता आया हूँ तेरे पैरों से रुखसार तक
जैसे हो गई जन्नत की सैर।।
x.)
वो दिन कुफ़्र हो मेरा, जिस दिन न सुनूँ तेरे घुंघरुओं की आज़ान।
घोलकर पी जाऊँ तेरी नशे वाली मुस्कान।
बिछाकर तेरा लाड-दुलार,
औढ़कर सौ जाऊँ तेरे गुदगुदे जिस्म का आसमान।।
xi.)
कुदरत भी तरस कर देखती है,
अपने मिलन का मोजिज़ा।
करूँ इबादत तेरे हुस्न की,
बदल बदल के अपने तन का लहजा।।

साईं इतना मुझको दे।
जिस्म मेरा करना दे।
उसके हुस्न की नमाजों को कज़ा।।
नटखट है दिल मेरा।
माखन सा जिस्म तेरा।
शरारतों को मेरी दे अपनी रज़ा।।

copyright by mohammad shoaib

Rights Available Click Here



Post your script for sell




1 thought on “Maakhan Jism”

Leave a Reply