SAFAR – E – ZINDAGI

 

एक सौदागर जिसका नाम अजहर है अपना सामान लेकर नदी के किनारे से गुज़र रहा है. अचानक उसने एक लड़की को नदी से निकाला  जिसका नाम ज़ुवैदा है जिसकी जान खतरे में थी और अपने कबीले में ले आया. जब उसे पता चला की बाड़ आने की वजाह से उस लड़की का सब कुछ तवाह हो गया और कोई नहीं बचा तो अजहर ने लड़की के इज़हार पर उस से शादी कर ली.

खानावदोश कबीला कुछ दिन के बाद वहाँ से दुसरे इलाके की तरफ निकला और एक जगह पड़ाव डाला जहां ज़ुवैदा को एक बेटा पैदा हुआ. अजहर और ज़ुवैदा बहुत खुश हें और उन्होंने एक पीर बाबा मजार पर बेटे की सलामती की दुआ की और वही बेटे के सीने पर एक तलवार का निशान बनवाया और अजहर ने दो तावीज़ लिए, एक बेटे को पहनाया और एक खुद ने पहन लिया.

कुछ दिन के बाद उन्होंने नदी पार कर दुसरे शहर में कमाने का फैंसला किया. दोनों अपने बच्चे और कुछ सामान के साथ नदी पर पहुंचे मगर उन्हें नाव चलाने वाला नहीं मिला. अजहर ने नाव को नदी में उतारा और खुद चलाने लगा अचानक बीच नदी में पहुँचने पर तूफ़ान आया और अजहर पानी में गिर गया और ज़ुवैदा नाव पर ही मर गयी… अजहर को पानी के जानवर ने जख्मी कर दिया मगर वो किसी तराह बच कर किनारे जाकर बेहोश हो गया.

दुसरे शहर में एक फ़क़ीर ने नदी से बच्चे को निकाल लिया जो मरी हुई औरत के साथ था और उसका नाम रहमत रखा. और दूसरी तरफ अजहर को बकरी चराने वालो ने उठाया और उसका इलाज़ किया मगर जब उसे होश आया तो वो पागल हो चूका था. और उन्होंने उस पागल को घर से भगा दिया. उसी दौरान बादशाह के यहाँ एक बीटा हुआ और उसका नाम जलाल रखा गया.

फ़क़ीर शहर में भीख मांगता और अपना और बच्चे का पेट भरता और इस तराह वक्त गुज़रा की बच्चा कुछ समझदार हुआ मगर अचानक फ़क़ीर की भीक मांगते हुए सड़क पर ही मौत हो गई और रहमत का कोई न बचा. उसी शहर में पागल अजहर भी भटक रहा था.

शहजादा जलाल कुछ समझदार हुआ और उसकी तालीम शुरू हुई तो उस दौरान शहजादे को एक दोस्त की ज़रुरत हुई जो हमेशा उसके साथ रहे और वाकी दोस्तों की तरह छोड़ कर अपने घर न जाए. बादशाह ने एक लावारिस हमसिन लड़के की तलाश का हुक्म दिया और सिपाहियों ने रहमत को एक हलवाई के यहाँ से बरामद किया जो फ़क़ीर के मरने के बाद उससे खाने के बदले काम लिया करता था और सक्ती से पेश आता था.

रहमत को बेहतर पोशाक और और बेहतर हालात में लाया गया और हमेशा के लिए शहजादे  जलाल के साथ कर दिया. दोनों की तालीम शुरू हुई शहजादे जलाल में गुरूर और तकब्बुर था जबकि रहमत नर्म दिल सब्र करने वाला और अक्लमंद था. रहमत ने जंगी हुनर और वाकी अक्लमंदी शहजादे से कई गुना ज्यादा हासिल कर ली. वक्त गुजरता गया और इस तराह दोनों जवान हो गए.

रियासत में सालाना जंगी मुकाबले का खेल था. और रियासत का सबसे माहिर लड़ने वाला मैदान में था अचानक एक पडौसी मुल्क का सबसे खूखार और माहिर लड़ने वाला मैदान में आ गया और उसने रियासत के सिपाही को शिकस्त दे कर क़त्ल कर दिया और पूरी रियासत को ललकारने लगा और गुरूर से चिल्लाने लगा मगर कोई उससे मुकाबले को आगे न बड़ा तब रहमत मैदान में आया और उसको बहादुरी से क़त्ल कर दिया.

एक बार शहजादी को फूलबाग व जंगल घूमने की ख्वाहिश हुई तो बादशाह ने जलाल व रहमत और वजीर जादी के साथ जाने की इज़ाज़त दे दी. जंगल में जलाल ने एक हिरन के तीर मार दिया. रहमत ने हिरन की बेबस निगाहों को देखा और तीर निकाल कर उसे आज़ाद कर दिया ये देख जलाल नाखुश था मगर उसने कुछ न कहा. वही जंगल में वजीर जादी को शांप ने काट लिया तो रहमत ने उसकी जान बचाई. वजीर जादी रहमत के इखलाक और मदद से खुश हुई.

एक दिन बादशाह दोनों की तालीम का जाएजा लेने के लिए मरकज़ में गया और उसने जब रहमत के हुनर देखे तो खुश हुआ मगर जलाल इतना माहिर और हुनर मंद न था तब बादशाह ने मरकज़ के मास्टर को इनाम में सोने के सिक्के दिए और शहजादे की तालीम पर और ध्यान देने को कहा.

मास्टर में लालच आ गया और उसने सोचा की अगर शहजादा जलाल रहमत से बेहतर और माहिर हो जाये तो बादशाह मुझे और ज्यादा इनाम देगा. मास्टर ने रहमत को कठिन कठिन सवालो में उलझाना शुरू कर दिया ताकि वो तालीम से दूर हो जाये मगर उसने हर सवाल का जवाब दिया. आखिर में मास्टर ने रहमत से कहा “तुम रात में जो भी सपना देखो उसे पूरा याद रखना और मुझे पूरा सुनाया करना ये तुम्हारी याददास्त का इम्तेहान है ”. रहमत में छल कपट न था उसने सपना देखा और सभी के सामने मास्टर को सुनाने लगा.

““ मेने देखा की हमारी शहजादी मेरे पैर दबा रही है, और हमारी वजीर जादी मेरा पंखा झल रही है और हमारे पडौसी मुल्क की बादशाह जादी मुझे खाना ला रही है, और वहां की वजीर जादी पानी लिए खड़ी है “”

शहजादा जलाल बहुत ज्यादा नाराज़ हो गया और उसने बादशाह से रहमत को ख़त्म करने की जिद की. बादशाह ने रहमत को कैद कर दिया और जलाल को यकीन दिलाया की रहमत को ख़त्म कर दिया गया इस तराह रहमत की जान बच गयी.

कुछ ही दिनों में शहजादे के चाल चलन बिगड़ने लगे और वो गलत दोस्तों में रहने लगा और दूसरी तरफ पडौसी मुल्क की नज़र रियासत पर थी और वो इसे हासिल कर के अपने मुल्क में मिलाना चाहता था. मगर वो बेहतर मौका तलाश कर रहा था. ये सब सोच कर बादशाह बहुत दुखी और परेशान था. अचानक वो दिन भी आ गया जब पडौसी मुल्क से एक परवाना आया जिसने रियासत को हिला कर रखदिया जो इस तराह था-

paigaam shaah khurram ki taraf se…ham riyasat-e-bukhara ko teen shart pesh kar rahe hen kisi ek ka intekhaab kare… (pahlee shart) “ham chaahte hen ki riyaast-e-bukhara hamen sonp do aur ye bukhara ki behtari men hoga”… (doosri shart) “jung ke liye teyaar ho jaao, jo fataah hasil kar le riyasat uski” ..(teesri shart) “hamare chand sawaalon ke jawaab suboot ke saath hamen pesh karo…agar jawaab suboot ke saath pesh karne men naakaam rahe to riyaast-e-bukhara hamaari hogi…”…sawaal is taraah hen…”asal ka kam-asal aur kam-asal ka asal kaun hai“…”chapar ka naati kaun hai…aur gaddi par gadhaa kaun hai”

बड़े मुल्क और बड़ी जंगी ताकत से मुकाबला करना आत्म हत्या करना था. बादशाह को कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था सिर्फ तीसरी शर्त को क़ुबूल करने के मगर लाख कोशिशो के बावजूद भी कोई ऐसा न मिल सका जो ये काम अंजाम दे सके. बादशाह दुखी था अचानक वजीर ने रहमत की याद दिलाई क्योंकि वो जानते थे की रहमत बड़ा अक्लमंद है शायद वो कोई मदद करे.

बादशाह ने वजाते खुद जेल में रहमत से इस मुश्किलात के बारे में गुफ्तगू की और रहमत ने कहा की में इसे अंजाम दूंगा मगर ये सवाल पडौसी मुल्क में जाकर ही हल हो सकते हें. रहमत का सामान-इ-सफ़र तेयार हुआ और वो कई मुश्किलात का सामना करते हुए पडौसी मुल्क में दाखिल हो गया.

उस मुल्क के मरकजी शहर के एक बाज़ार में उसकी मुलाकात एक मशहूर तवायफ “ज़ारा बाई” से हुई. रहमत ने उसे अपनी बहन का दर्ज़ा दिया तवायफ ने रहमत का अच्छा किरदार और बुलंद इखलाक देखा तो उसने अपनी पुरानी ज़िन्दगी से निकलकर एक नेक ज़िन्दगी जीने का फैंसला लिया.

मुल्क में आने का मकसद दिल में रखते हुए रहमत ने दरवान सिपाहियों को लालच देकर दरबार में जाना शुरू किया. वो रोज़ दरवार जाता और सिपाहियों को सोने का एक एक सिक्का देता और वो उसे अंदर जाने देते. बादशाह को एक सफे सालार की ज़रुरत हुई और रहमत ने एक खतरनाक मुकाबला जीत कर ये नौकरी हासिल कर ली. जब उस मुल्क के वजीर ने उसके हुनर और बहादुरी देखी तो उसे अपना दामाद बना लिया और उसकी शर्त के मुताबिक़ उसे बस्ती से दूर एक नौतामीर महल दिया जिसमें दोनों बड़ी मोहब्बत से रहने लगे.

कुछ दिन गुज़रे की रहमत ने बाज़ार से एक ताज़ा कटा हुआ मेंडे का सर ख़रीदा जिसमें से अभी भी खून टपक रहा था और उसे एक सफ़ेद कपडे में बाँध कर और अपना छुरा खून में रंग लिया और इस कैफियत में घर बीबी के पास पहुंचा. और बीबी ने पूछा तो सख्त आवाज़ में कहा की “ ये सर है “ जल्दी गढ़ा खोदो ओर इसे उसमें दफन कर दो और ये छुरा भी साफ़ कर के रख दो और अब सवाल न करना. वो डर गई और उसने बैसा ही किया.

रहमत ने कई दिन ये खेल ज़ारी रखा. उसकी बीबी एक दिन फरार हो गई और बादशाह को सारी कैफियत बयान की. रहमत को वही सिपाही गिरफ्तार करने आये जो उससे सिक्के लिया करते थे मगर इस बार उन्होंने उस पर कोई रिआयत न की बल्कि और ज्यादा सख्ती से पेश आये. बादशाह ने वजीर की बेटी और रहमत के घर के पहरेदारो की गवाही पर और बिना तहकीक किये रहमत को फांसी की सजा सुना दी.

फांसी शहर के बीच चौराहे पर लगनी थी. तमाम भीड़ में रहमत का पागल बाप भी था. जब फांसी के लिए रहमत के शाही कपडे उतारे गए तो उसके बाप ने बचपन की निशानियाँ देखी तो उसकी याददास्त वापस आई और उसे पहचान लिया. और इधर तवायफ अपने भाई की सलामती के लिए मरने और मारने को तेयार थी और मैदान में पहुँच गई. अब रहमत ने बादशाह से गुफ्तगू की ख्वाहिश पेश की और बादशाह के सामने वो परवाना पेश कर दिया ये देख सभी हैरान थे.

रहमत ने तीनो सवालो के जवाब उनके सुबूत के साथ पेश कर दिए और बादशाह खुश हुआ और रहमत को अपनी शहजादी शौंप कर उसे अपना वली अहद मुक़र्रर कर लिया. अब रहमत एक लश्कर लेकर अपने मुल्क रवाना हुआ मगर जलाल का एक बड़ा लश्कर उसका इंतज़ार कर रहा था. जलाल ने अपने बाप को कैद कर के हुकूमत अपने हाथ में ले ली थी और रहमत को क़त्ल करना चाहता था. दोनों लश्करो में एक बड़ी जंग हुई रहमत भी कुछ घायल हुआ और उसने लड़ते हुए जलाल को अपनी तलवार की ज़द में लिया तो जलाल ने हथयार डाल दिए रहमत ने उसे क़त्ल नहीं किया उसे कैद कर के बादशाह को आज़ाद किया.

बादशाह अपने बेटे जलाल से बहुत नाराज़ था उसने उसे क़त्ल करने का हुक्म दिया और शहजादी को रहमत की खिदमत में पेश कर दिया और रहमत को मुल्क का शहंशाह मुक़र्रर कर दिया. वजीर की बेटी जिसकी एक बार रहमत ने जान बचाई थी रहमत से मोहब्बत करती थी और उससे शादी करने का इज़हार किया और रहमत ने उसे क़ुबूल किया… इस तरह चार रानियों के साथ रहमत ने वो सपना हकीकत में दोहराया और शहजादा जलाल और मास्टर को दिखाया जो अपनी गलतियों पर शर्मिंदा थे. रहमत ने उन्हें हिदायत दी और मुआफ कर के आज़ाद कर दिया.

इस तराह एक खानाबदोश ज़िन्दगी का सफ़र एक बहादुर, आदिल और दयालु शहंशाह तक पहुंचा…..

THE END

Rights Available Click Here



Post your script for sell




Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *